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काव्य कुंज

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विधा तारीख

सत्ता का चक्रव्यूह

जहाँ बिकती थी शिक्षा, वहाँ स्कूल नए सजाए, मोहल्ला क्लीनिक खोल के उसने, लाखों दर्द मिटाए। बिजली-पानी सुलभ किया, दी महिलाओं को राह, इस जन-कल्याण मॉडल से ही, उठी तंत्र में आह। इस बढ़ते हुए प्रभाव को, भला कैसे वो सहते? सियासत के वो पुराने चेहरे, मन ही मन में दहते। तब जांच एजेंसियों को अपना, मोहरा उन्होंने बनाया, बिना सबूतों के पन्नों पर, एक फर्जी केस सजाया। तिहाड़ की सलाखों में, उस विचार को कैद कर डाला, मीडिया के झूठे शोर ने, उन पर कीचड़ खूब उछाला। भ्रम फैलाकर चुनावों में, सत्ता उनकी छीनी गई इस द्वेष की राजनीति से, जनता ही तो पिस गई । वर्षों तक चला मुकदमा, सिर्फ और सिर्फ कयासों पर, न्यायपीठ ने धोया आखिर, वो दाग जो थे लिबासों पर। "कट्टर ईमानदार" है वह, अदालत ने भी मान लिया, पर इस साज़िश ने, एक बेहतरीन मॉडल को रौंद दिया । भले ही रौंद दिया हो तुमने, वो बाग जो उसने लगाया है, पर आम जन मन के भीतर, उसने इंकलाब बसाया है । वक्त का पहिया घूमेगा, फिर से वो सुबह आएगी, सच्चाई की इस राह पर, फिर से जीत लहराएगी।

कलमकार

खिरसिंधु साहू

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