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काव्य कुंज

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विधा तारीख

आस्था में सेंध

राम नाम का जाप करते, जो सत्ता के पार गए, धर्म-ध्वजा को ढाल बनाकर, जग के ठेकेदार भए। किंतु समर्पण की निधि में, नीयत इनकी डोल गई, भक्ति की आड़ छुपी जो, कालिख सारी खोल गई। जिस पावन नौका ने इनको, पार लगाया भवसागर, कहीं डूब न जाए नैया, पापों से इनके ही भर कर। पाई-पाई जोड़ भक्तों ने, श्रद्धा से जो दान दिया, उसी धन की चोरी करके, श्रीराम का अपमान किया। ईंट-ईंट जो जुड़ी राम की, उसमें भी व्यापार किया, कैसा यह धर्म तुम्हारा, आस्था पर प्रहार किया? जय श्रीराम पुकार-पुकार, जो गूँज उठाते फिरते थे, धर्म-रक्षक होने का जो, दम भरते दिखते थे। सूंघ गया है सांप उन्हें क्यों, होंठ सिले अब कैसे हैं? सत्य खड़ा है नग्न सामने, फिर भी मौन वो तैसे हैं। कण-कण में जो राम बसे हैं, वो सब कुछ ही जानते हैं, छली-कपटी और पाखंडी को, वो पल में पहचानते हैं। जनता की निष्कपट भक्ति का, जो तुमने मज़ाक किया, धर्म-कर्म के आवरण में, स्वार्थी होकर काज किया। समय देख रहा है सब कुछ, छद्म वेश ये टूटेंगे, जन-जन की जब आँख खुलेगी, तब सिंहासन छूटेंगे।

कलमकार

खिरसिंधु साहू

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