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नियत और दिखावा
रचनाकार की आवाज में:
नियत कितनी भी उजली हो,
दुनिया चेहरों से पहचान करती है,
यहाँ शब्दों की ऊँची मीनारें,
अक्सर चरित्र से अधिक सम्मान धरतीं हैं।
कपड़ों की चमक, मुस्कानों का शोर,
लोगों की दृष्टि को भरमा देता है,
भीतर कितना अँधियारा पल रहा,
यह सत्य कहाँ सबको दिख पाता है।
कोई मौन रहकर दीप जलाए,
तो भीड़ उसे साधारण कहती है,
और कोई छल को सोने में ढाले,
तो दुनिया उसकी जय-जयकार करती है।
यह संसार आँखों का व्यापारी है,
यहाँ मूल्य मुखौटों का होता है,
भीतर की तपती हुई सच्चाई पर,
अक्सर झूठ का पर्दा होता है।
पर ऊपर कहीं एक सत्ता ऐसी भी,
जो शब्द नहीं, मन पढ़ती है,
जो हाथों के दान नहीं,
दान के पीछे की भावना गिनती है।
ईश्वर को नहीं चाहिए ऊँचे मंच,
न आडंबर की आरती उसे प्रिय है,
वह तो उस थके हुए इंसान में बसता,
जिसकी नीयत अब भी पवित्र है।
जिसने भूखे को रोटी बाँटी,
और बदले में नाम नहीं माँगा,
जिसने आँसू चुपचाप पोंछ दिए,
पर कोई सम्मान नहीं चाहा।
जिसने भीड़ में रहकर भी,
अपने अंतर्मन को कलुषित न होने दिया,
जिसने हार के क्षण में भी,
सत्य का हाथ न छोड़ दिया।
दुनिया चाहे तौल ले तुमको,
तुम्हारे वस्त्रों और शब्दों से,
पर ईश्वर तुम्हें परखेगा,
तुम्हारे मौन कर्मों के अर्थों से।
इसलिए इतना ही पर्याप्त है—
मन का दर्पण स्वच्छ रहे,
क्योंकि अंततः चेहरे मिट जाते हैं,
पर नियत का प्रकाश अमर रहे।
कलमकार