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हे मतदाता: भाग्यविधाता
रचनाकार की आवाज में:
नभ की ओर न ताको तुम, भाग्यविधाता वहाँ नहीं है,
लोकतंत्र की इस धरा पर, ईश्वर का कोई काम नहीं है।
तुम्हारे कल की हस्त-लकीरें , अब वो नेता लिखता है,
वोट दिया जिसको तुमने ही, वह भाग्य तुम्हारा गढ़ता है।
उठो, जागो और आँखें खोलो, अपने मत की शक्ति जानो,
मूर्ख, कलंकित, अपराधियों को, अपना नेता कभी न मानो।
जिनके हाथों में है कालिख, जो खून और छल से सने हुए हैं,
मत सौंपो ये डोर उन्हें, जो स्वयं पाप से बने हुए हैं।
मत बेचना निज ज़मीर, तुम इस छलिए बाज़ार में,
मत कुचलने देना भविष्य, इन गुंडों के दरबार में।
बँटती हो गर शराब या दौलत, उस लालच को ठोकर मारो,
धमकी से जो वोट ऐंठ लें, उन गुंडों को आज नकारो।
दाग़दार जो पहन के आएँ, उजले कपड़े और मुखौटे,
इनके वादे हैं सब झूठे, इनके सारे सिक्के खोटे।
तेरी एक उंगली की ताक़त, गद्दी से इनको उखाड़ेगी,
भूल अगर जो की तूने तो, तेरी आने वाली पीढ़ी हारेगी।
मतदान नहीं ये एक अस्त्र है, भ्रष्टों का संहार करो तुम,
सच्चे, योग्य और कर्मठ को ही, सत्ता का अधिकार दो तुम।
देश की खातिर, स्वयं की खातिर, आज तुम्हें ये प्रण है लेना,
अपराधी और जाहिल को अब, अपना कीमती वोट न देना।
कलमकार