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नए दौर का सुशासन
रचनाकार की आवाज में:
आइए, हम सब मिलकर इस नए दौर के 'सुशासन के मॉडल' का जश्न मनाएं! एक ऐसा मॉडल जहाँ मेहनत और ईमानदारी जैसी पुरानी, घिसी-पिटी अवधारणाओं को म्यूजियम में रख दिया गया है, और 'जुगाड़' ही सफलता का एकमात्र राष्ट्रीय राजमार्ग बन चुका है। अब ज्ञान अर्जित नहीं किया जाता, बल्कि 'डाउनलोड' किया जाता है— वह भी परीक्षा से ठीक एक रात पहले, किसी गुप्त व्हाट्सएप ग्रुप से, लाखों रुपयों के आसान किश्तों में।
अब सोचिए, वह दिन कितना सुहाना होगा जब आप किसी सर्वसुविधायुक्त अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में लेटे होंगे। आपका सर्जन, जिसने अपने पिता की तिजोरी खाली करके मेडिकल की डिग्री का 'सम्मान' प्राप्त किया है, हाथ में छुरी पकड़कर यूट्यूब पर ट्यूटोरियल खोज रहा होगा— "अपेंडिक्स का ऑपरेशन कैसे करें (स्टेप बाय स्टेप हिंदी में)"। और अगर बीच में विज्ञापन आ गया, तो क्या हुआ? मरीज की जान का क्या है, आत्मा तो वैसे भी अजर-अमर है! डॉक्टर साहब तो बस इस महान 'सिस्टम' की देन हैं, जिन्होंने चीटिंग करके यह साबित कर दिया था कि वे किसी भी नियम को बायपास करने में विशेषज्ञ हैं।
और फिर आते हैं हमारे होनहार इंजीनियर! उनके द्वारा बनाए गए पुल और इमारतें इतनी दार्शनिक और 'स्मार्ट' हैं कि वे समझते हैं— जब इंसान ही नश्वर है, तो कंक्रीट की इमारतें अमर कैसे हो सकती हैं? इसलिए, वे अक्सर उद्घाटन के रिबन कटने से पहले ही ढहकर अपनी विनम्रता का परिचय दे देते हैं। जिन्होंने सच में रात-दिन एक करके पढ़ाई की थी, वे होनहार युवा शायद आज किसी सरकारी दफ्तर के तहखाने में धूल फांकती फाइलें ढो रहे होंगे या सड़क किनारे खड़े होकर सोच रहे होंगे कि ईमानदारी का यह कौन सा शर्बत उन्होंने पी लिया था।
शिक्षा और स्वास्थ्य— जो किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं, हमने उन्हें बड़े सलीके से 'सेल' पर लगा दिया है। जब नींव ही बेईमानी के गारे और भ्रष्टाचार की ईंटों से चुनी गई हो, तो हम बहुत जल्द एक ऐसा समाज बनाने वाले हैं जिसे किसी बाहरी दुश्मन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
ग्लोबल विलेज में अब हमें सीना तानकर चलने की क्या जरूरत है? हम गर्व से सिर झुकाकर कह सकते हैं कि हम वो महान लोग हैं, जो अपना विनाश खुद अपने पैसों से खरीदते हैं। जब जवाबदेही नाम की चिड़िया ही देश से उड़ चुकी है, तो फिर कैसा डर?
अब तो बस राम भरोसे तंत्र है, और नोटों से चलता मंत्र है!
कलमकार