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काव्य कुंज

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विधा तारीख

मौन का संताप

सक्षम अगर खामोश हो, लुटती यहाँ पर बस्तियाँ, चुपचाप बलि चढ़ रहीं हैं, सत्य की प्रत्येक हस्तियाँ। अन्याय को जो देखकर, भी होंठ अपने सी रहे, वे नागरिक तो बस यहाँ, मृत-तुल्य होकर जी रहे। यह मौन ही उद्गम यहाँ, सब लूट का, सब पाप का, अधिकार केवल मांगना, है रूप केवल संताप का। कर्तव्य को जो भूल कर, बैठे हुए आराम से, वे क्या करेंगे सामना, इस वक्त के संग्राम से? आवाज़ अपनी आज दो, हर झूठ को अब टोक दो, बहती हुई अन्याय की, इस धार को अब रोक दो। नव-काव्य के इस कुंज से, नव-चेतना की धार हो, हर लेखनी हर शब्द का, अब झूठ पर प्रहार हो। अंधेर नगरी को मिटा, फिर सत्य का सूरज उगे, हर एक सोई चेतना, अधिकार के खातिर जगे। जागृत जन-हृदय हुए, नव-भोर का तब गान हो, देश के हर व्यक्ति का, अब राष्ट्र में योगदान हो।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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