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काव्य कुंज

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विधा तारीख

दरबारी संस्कार

शर्म बेचकर जो अपनी, अब दरबारी हो जाते हैं, वही आज के दौर में, सबसे भारी हो जाते हैं। योग्यता रद्दी है, डिग्रियां खामोश खड़ीं, जो तलवे चाटें बेहतर, वो सत्ताधारी हो जाते हैं। न कोई विज़न पास है, न जनता से सरोकार, हुज़ूर की 'हाँ' में 'हाँ' मिलाना, अब इनका संस्कार। खादी भी अब लजाता है, इन बेशर्मों को देख, जिनकी रीढ़ की हड्डी ही, है घुटनों का विस्तार। सच कहना इस दौर में, अब सबसे बड़ा अपराध है, चाटुकारिता की चाशनी में, डूबा हर संवाद है। शेर पिंजरों में हैं, और गीदड़ पहने ताज को, मूर्खता की गोद में, बैठा सत्ता का उन्माद है। कुर्सी की खातिर जो, आत्मा भी गिरवी रख दे, वो जन-सेवक नहीं, बस पद का भूखा है। वतन के जख्म क्या भरेंगे, ये जी-हजूरी करने वाले, इनका ज़मीर तो कब का, मर चुका है।

कलमकार

खिरसिंधु साहू

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