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काव्य कुंज

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विधा तारीख

नई दिशा, नया सवेरा

सुनो साथियों, सुनो रे भाई, नई दिशा अब आई है, शिक्षा की इस फुलवारी ने, नई उमंग जगाई है। छोड़ रटन की पुरानी बातें, समझ की बेला आई है, नीति नई और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! हाँ, नया सवेरा लाई है दोस्त बनीं अब नई किताबें, खुशी-खुशी हम पढ़ते हैं, रटना अब तो काम नहीं, हम 'करके' खुद को गढ़ते हैं। मातृभाषा की छाँव में रहकर, नई पहचान बनाना है। सीख-सीख कर नए हुनर, अब अंबर को छू आना है। चेहरों पर मुस्कान सजी है, कैसी रौनक छाई है, नई नीति और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! शिक्षक अब तो बने सखा हैं, राह दिखाने वाले वो, हर बच्चे के मन के भीतर, दीप जलाने वाले वो। प्रश्न पूछने की आज़ादी, हर बच्चे ने पाई है... नीति नई और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! केवल परीक्षा पास न करना, जीवन को अब गढ़ना है, बिना खौफ के, बिना रटन के, सीढ़ियों पर चढ़ना है। मूल्यांकन अब ऐसा होगा, हर एक खूबी पहचान हो, हर बच्चे की अपनी अलग ही, सुंदर सी कहानी हो। रचनात्मकता की हर उमंग, हमने आज जगाई है नीति नई और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! माटी की खुशबू भी होगी, और गगन का ज्ञान भी हो, नई तकनीकें सीखें बच्चे, संस्कारों का ध्यान भी हो। भारत का जो गौरव-दर्शन, वो जन-जन तक जाएगा, हर बच्चा अपनी माटी का, सच्चा मान बढ़ाएगा। डिजिटल और परंपरा की, सुंदर ताल मिलाई है... नीति नई और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! आओ मिलकर कदम बढ़ाएँ, इस बदलाव का गान करें, ज्ञान, कला और नवाचार से, देश का नव-निर्माण करें। हर स्कूलों में गूँज उठे अब, ऐसी आस जगाई है... नीति नई और पाठ्यचर्या, नया सवेरा लाई है! सुनो साथियों, सुनो रे भाई, नई दिशा अब आई है, शिक्षा की इस फुलवारी ने, नई उमंग जगाई है!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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