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शिक्षा का मायाजाल
रचनाकार की आवाज में:
महंगी हुई है मणिक-सी विद्या, डिग्री कौड़ी मोल है,
ज्ञान के इस क्रय-विक्रय में, हर तरफ बस झोल है।
खून-पसीने की कमाई, झोंक दी जिस आग में,
कागज़ों का ढेर ही बस, आया उनके भाग में।
कौशल है शून्य अथवा न्यून, बस ज्ञान है रटा हुआ,
मस्तिष्क का विस्तार भी, चंद पन्नों में सिमटा हुआ।
हाथों में हुनर नहीं, बस डिग्रियों की व्यर्थ होड़ है,
'सभ्य' दिखने वाली पीढ़ी, महज़ रट्टुओं का जोड़ है।
वादे गगन को चूमते, और विज्ञापनों का शोर है,
पर यथार्थ की इस भोर में, छाया तिमिर घनघोर है।
स्वर्णिम भविष्य दिखा रहे, जो रंग-बिरंगे इश्तहार,
वे छल रहे हैं युवा पीढ़ी को, कर रहे भद्दा व्यापार।
इरादे हैं इनके क्षुद्र कितने, और कर्म का अकाल है,
शिक्षा नहीं, यह तो बिछाया स्वार्थ का मायाजाल है।
सपनों के सौदे हो रहे, और बिक रहा है बचपन यहाँ,
कागज़ के इन टुकड़ों से, आबाद होगा जीवन कहाँ?
टूटेगा यह भ्रम सभी का, जब हुनर की बात होगी? खोखले इस तंत्र पर, फिर ज्ञान की आघात होगी?
जब 'डिग्रियों' से पार जा, 'कौशल' की पहचान होगी,
फिर उसी दिन वतन के, युवाओं की सच्ची उड़ान होगी!
कलमकार