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महानायक का तिलिस्म
रचनाकार की आवाज में:
कहा गया था वो त्यागी है, मोह-माया छोड़ कर आया है,
किसी ने कहा था, चुपके से वो माँ के गहने चुरा लाया है।
'वैराग्य' नाम दिया उस पलायन को, गजब है यह जादूगरी
फकीरी के इस चोले में, न जाने क्या-क्या छुपाया है ।
कहता है कि संघर्षों में, उसने गर्म चाय पिलाई थी,
पर किसी ने भी उस स्टेशन पर, उसकी केतली न पाई थी।
चाय बेचते नहीं दिखा वो, ये कैसा गजब तमाशा है?
पर देश बेचते सब देख रहे, अब ये हर चेहरे की भाषा है।
हवा में वादे तैर रहे हैं, ज़मीन पर खौफ का पहरा है,
बातों में अमृत छलकता है, पर घाव बहुत ही गहरा है।
संवेदनहीनता की उसने, अब सारी सीमाएँ लांघ दीं,
रोती-बिलखती जनता की, उम्मीदें सूली पर टांग दीं।
जब दर्द से बस्ती चीख रही, वो कैमरों से खेल रहा,
हर एक नाकामी का मलबा, गैरों के सिर पर धकेल रहा।
आँखों का पानी सूख गया, बस झूठा एक खुमार है,
कवचों और पर्दों के पीछे, छुप कर बैठा 'सरदार' है।
पर धन्य है वो अंधी जनता, जो ऐसे छलावे में जीती है,
ज़हर मिला हो प्याले में, पर अमृत समझ कर पीती है।
लुट रहा है घर सामने उनके, फिर भी जय-जयकार करें,
खुद अपनी ही बर्बादी से, न जाने कैसा अंधा प्यार करें!
कलमकार