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शब्दों का दर्पण
रचनाकार की आवाज में:
मंच सुसज्जित, शब्द सुवासित, गूँज रहा उपदेश महान,
"वाणी में हो शील-मर्यादा," बाँट रहे थे यही ज्ञान।
सुनकर उनके मीठे प्रवचन, मुग्ध हुआ था यह संसार,
मानो क्षमा, शील, करुणा की, बह रही अविरल धार।
किंतु समय की पगडंडी पर, याद आ गए वे संवाद,
जब उनके ही कटु वचनों ने, जन्म दिए थे सौ विवाद।
दूसरों पर कीचड़ फेंका था, तब कहाँ थी यह मर्यादा?
आज मंच पर साधु बने हैं, कैसा है यह छद्म इरादा?
कभी किसी के वैधव्य पर, जिसने कसे थे तीखे तान,
कभी जर्सी गाय कह जिसने, किया सरेआम अपमान।
मातृ-शक्ति का मान घटाकर, जो गढ़ते थे नए प्रवाद,
आज वही कैसे दे रहे, भाषा की गरिमा का संवाद?
उपदेशों की बहती गंगा, आचरणों की सूखी धार,
स्वयं भूल बैठे हैं वक्ता, अपने ही तीखे प्रहार।
जो काँटे निज को चुभते हों, वे औरों की राह न बोएं,
अपने लिए बिछा कर मखमल, दूजे को शूलों पर न सुलाएं।
प्रवचन का यह महल काँच का, एक सत्य से ही ढहता,
वही वचन जो स्वयं न भाये, औरों से क्यों है कहता?
मानवता का मूल नियम यह, जो न रुचे निज के अभिमान,
वह कटु-कर्म औरों के प्रति भी, कभी न करे कोई इंसान।
कलमकार