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काव्य कुंज

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विधा तारीख

उधार की बुद्धि

सहूलियत के रेशमी जाल ने, बुद्धि को यूँ जकड़ा है, कि रीढ़ की अपनी दृढ़ता छोड़, हमने तार को पकड़ा है। जो मस्तिष्क कभी ब्रह्मांड की गुत्थियाँ सुलझाता था, वो अब ‘सर्च-बार’ की चौखट पर, उत्तर माँगने आता है। ये तरक्की नहीं—एक मौन आत्मसमर्पण है, जहाँ हर सुविधा, अक्षमता का दर्पण है। स्मृतियों के वे लहलहाते खेत, अब सूखे बंजर हैं, क्योंकि ‘क्लाउड’ की धार से, यादों के रिश्ते घायल हैं। वो तर्क, वो मंथन, वो उलझकर खुद सुलझ जाना, मशीनों ने छीन लिया हमसे चिंतन का वो खजाना। हम ‘स्मार्ट’ हुए हैं, या औज़ारों में ढल रहे हैं? बिना पसीने के सपनों की, रेत की दीवारें गढ़ रहे हैं। जो कविता पीड़ा से नहीं, केवल गणित से निकलती है, वो शब्दों में मीठी सही, पर आत्मा को कहाँ बदलती है? चेतो, ऐ मानव! तुम्हारी श्रेष्ठता मशीनों की तीव्रता में नहीं, तुम्हारी जीत तो गिरकर फिर उठने की क्षमता में थी। यदि संघर्ष की अग्नि बुझी, तो बस राख रह जाएगी, यह मशीनी सभ्यता तुम्हें केवल ‘डेटा’ कह पाएगी। पंखों को स्वतंत्र रखो, इन वैशाखियों का मोह त्यागो, सहूलियत की गहरी नींद से अब स्वयं को जागो। यदि बुद्धि किराए पर चली गई, तो अस्तित्व नीलाम होगा, और आने वाली पीढ़ियों के हाथों में— बस एक खाली जाम होगा।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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