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काव्य कुंज

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विधा तारीख

सोच के नए रंग

दुनिया इतनी सीधी या इतनी बँटी हुई भी नहीं, हर बात बस 'हाँ' या 'ना' में सिमटी हुई नहीं। काले और सफ़ेद के बीच अनगिनत रंग बसे हैं, जो ठहरकर देखते जग को, वे ही समझ सके हैं। जरा ठहर हम जाँच करें तो, बात नया कुछ आएगा, तर्क की छोटी-सी लौ भी, अंधविश्वास मिटाएगा। जो हमारी बात न माने, वह दुश्मन कहलाए क्यों? अलग-अलग विचारों से, मन में बैर उग आए क्यों? सहमति और असहमति के मध्य भी संवाद है, शांत मन से बात हो, तो हर विवाद का समाधान है। रिश्ते जीत से बड़े हैं, अहंकार से भी भारी, सुनना भी एक कला है, यही समझ है प्यारी। हर उत्तर अंतिम नहीं, हर राय अटल होता नहीं, जो दिखता है आँखों को, वही वास्तविकता नहीं। प्रश्नों से ही प्राप्त होता, ज्ञान का उजियारा, सोच-समझकर जो चलता है, वही हरता अंधियारा। थोड़ा ठहरो, थोड़ा सोचो, खुद से करो सवाल, सुनी-सुनाई बातों पर मत बुनो विचारों का जाल। 'क्यों' और 'कैसे' पूछने से कोई छोटा नहीं होता, अपनी बुद्धि जो जगा सके, वह अँधेरा ना ढोता। सोच की खिड़की खोलो, नए क्षितिज को पहचानो, हर रंग में छिपे सत्य को, अपने विवेक से जानो। जब इसकी ज्योति से, भ्रम का बादल छंट जाएगा, दुनिया भी नई लगेगी, और मन भी नया खिलेगा।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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