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काव्य कुंज

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विधा तारीख

संस्कारों का सूर्यास्त

दौड़ रहे सब अंधी दौड़, जाने किसकी चाहत में, बेच रहे हैं चैन-सुकून, झूठी एक विरासत में। बाहर-बाहर चमक बढ़ी पर, भीतर धुंध घनेरी है, जिसे हम अपना कहते हैं, वो बस मिट्टी की ढेरी है। पश्चिम की इस चकाचौंध ने, ऐसा जादू डाला है, अपनी ही जड़ों को हमने, खुद हाथों से निकाला है। सादा जीवन, ऊँचे चिंतन, अब बस एक कहानी है, मर्यादा की प्यासी धरती, मांग रही अब पानी है। सुख को खोजा बाज़ारों में, मन का सुकून गँवा बैठे, काँच के सुंदर बंगले पाए, अपनी रूह जला बैठे। दिखावे की इस दुनिया में, रिश्ते अब बस 'स्क्रीन' हुए, इंसानों के भाव यहाँ अब, वस्तु जैसे दीन हुए। संस्कार की मद्धम लौ को, फिर से आज जलाना होगा, मशीन बन चुके पुतलों को, फिर इंसान बनाना होगा। त्याग जहाँ श्रृंगार बने और, करुणा ही पहचान रहे, मिट न जाए हस्ती अपनी, भारत का सम्मान रहे।

कलमकार

खिरसिंधु साहू

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