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वसंत ऋतुराज क्यों?
रचनाकार की आवाज में:
पूछते हैं लोग अक्सर, क्यों बसंत ही ऋतुराज है?
क्यों इसी के भाल सजता, श्रेष्ठता का ताज है?
ग्रीष्म का संताप न इसमें, शीत का न दंश है,
अतिवृष्टि न वर्षा की, न पतझड़ का विध्वंस है।
हर ‘अति’ का परिहार करे जो, संतुलन का सार है,
न रातों की ठिठुरन इसमें, न धूप का प्रहार है।
सच्चा नृप तो वही जगत में, समभाव से जो सींच दे,
हर ले सारे कष्ट प्रजा के, नव-सृजन की रेखा खींच दे।
सूखी-निर्जीव सी डालों पर, जब कोपलों का राज हो,
मानो दरिद्र से तरुवर को, मिल गया नव-स्वराज हो।
सरसों का बिखरा है सोना, पलाश ने आभा बिखराई है,
बौरों की मादक महक से, कुदरत ने ली अंगड़ाई है।
भौंरे इसके चारण बनकर, करते मंगल गान हैं,
कोयल की पंचम कुहू में, बसते इसके प्राण हैं।
मलय-पवन की पालकी पर, देखो बसंत सवार है,
झूम उठती है धरा, इसका सजा हुआ दरबार है।
जड़-चेतन के रोम-रोम में, जो नव-प्राण संचार दे,
मृत्यु-सम उस पतझड़ को भी, नव-जीवन का उपहार दे।
गीता में स्वयं योगेश्वर ने, निज-रूप इसे बताया है,
इसीलिए इस ऋतु ने जग में, 'ऋतुराज' पद पाया है।
कलमकार