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रचनाकार की आवाज में:
बिन क्षुधा के स्वाद कैसा, व्यर्थ छप्पन भोग हैं,
भूख की तपिश न हो तो, मिष्ठान्न भी बस रोग हैं।
सूखी रोटी में छुपी जो, तृप्ति की वह बात है,
भूख के ही आँगन में खिलती, स्वाद की सौगात है।
आँसुओं की बूँद बिन, मुस्कान की कीमत कहाँ?
दर्द के अहसास बिन, सुख का भला है अर्थ क्या?
घोर रजनी के हृदय से, फूटती जब भोर है,
दुःख के सागर पार ही, तो सुख का मीठा ठौर है।
तप कर ही तो स्वर्ण में, वह दमकती निखार है,
काँटों की चुभन के बाद ही, तो फूल से यूं प्यार है।
संघर्ष की भट्टी में जब, इंसान तप कर ढलता है,
तभी तो उसके कर्म का, भाग्य निखर कर फलता है।
तो छाँव की मत कर तलब, गर धूप में जला नहीं,
वह मुसाफिर क्या जो राहों, की थकान से गला नहीं।
मान ले इस सत्य को, यही प्रकृति का विधान है,
पीड़ा और संघर्ष ही, तो सुख का असली भान है।
कलमकार