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काव्य कुंज

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विधा तारीख

समय का पहिया

चलता रहता है निरंतर, समय का यह पहिया, न आदि इसका ज्ञात हमें, न अंत का कोई जरिया। यह अविराम, निर्बाध अपनी, धुरी पर ही घूमता, परिवर्तन का वेग क्षण में रंक को राय कर देता, पतझड़ की वीरानियों में, यही वसंत सजाता है, काली घनी रातों के मुख पर, भोर यही ले आता है। न्याय का यह चक्र है,जो बोओगे वो पाओगे, वक्त की चक्की से बचकर, बोलो कहाँ जाओगे? न यह किसी का मीत है, न किसी से इसे बैर है, जो न चला इसके साथ, फिर उसकी कहाँ खैर है? "मत कर गुरुर ऐ राही, अपनी ऊँची उड़ान पर, इसकी पैनी दृष्टि है, हर छोटे-बड़े इंसान पर।" कल जो था शिखर पर बैठा, आज तलहट में खड़ा है, समय का पहिया ही जग में, सबसे बलवान और बड़ा है। ​सीख यही है जीवन की, कि ठहराव ही तो मरण है, निरंतर चलते रहना ही, प्रगति पथ का चरण है।"

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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