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काव्य कुंज

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विधा तारीख

खुद की मटकी सूखी है

विश्वगुरु का चोला ओढ़े, झूठी शान दिखाई है, आटे-दाल के भाव न पूछो, कैसी आग लगाई है ! लंगर चलता सात समंदर, अपनी बस्ती भूखी है, सबको जल पिलाने वाले की, खुद की मटकी सूखी है। बंदरगाह की रौनक देखो, जहाज लदे हैं मालों से, और यहां आवाम तड़पती, तेल-गैस के भावों से। डॉलर की खनक बहुत, पर अपना सिक्का रोता है। अपने ही घर की चौखट पर, किसान भूखा सोता है। साहब का उपदेश यही है— "त्याग करो कुछ देश के नाम", बिना तेल के दीये जलाओ, इसी में है अब चारों धाम। खुद के बच्चे भूखे तड़पें, पर धन और कमाना है, 'घर फूंक तमाशा देखने' का, नियम बड़ा पुराना है। पेट पर पत्थर रखकर, गर्व से ताली-थाली बजाओ, देश के हक का विदेश जा रहा, तुम 'जय हिंद' गाओ!

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

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