Logo

काव्य कुंज

A+
A-
🌙
विधा तारीख

समझदारी का छलावा

दुनिया के इस भरे बाज़ार में, अक्सर वही सबसे ज्यादा ठगा जाता है, जिसके माथे पर 'समझदारी' का तिलक, समाज बड़ी श्रद्धा से लगाता है। एक जुमला, एक तीर बनकर, अक्सर सीने के पार उतर जाता है— "तुम तो समझदार हो, तुम्हें समझना चाहिए" और यहीं से शोषण का दौर शुरू हो जाता है। जब अन्याय अपनी सीमा लांघता है, और तुम्हारा लहू खौलने लगता है, तब कोई धीरे से कान में कहता है— "मर्यादा मत छोड़ो, तुम तो समझदार हो।" किसी की जिद के आगे जब तुम झुकते हो, इसे तुम्हारी हार नहीं, परिपक्वता कही जाती है, पर सच तो यह है कि उस मोड़ पर, तुम्हारे आत्म-सम्मान की बलि दी जाती है। गलत को यहाँ सुधारा नहीं जाता, बस सही को मौन रहना सिखाया जाता है, नादान की हर खता को 'नादानी' कह कर, समझदार के कंधे पर बोझ बढ़ाया जाता है। ये समझदारी नहीं, एक सुसज्जित जंजीर है, जो तुम्हें अपनी भावनाओं का गला घोंटना सिखाती है, ये वो मीठा ज़हर है जो किश्तों में, एक जीवंत मनुष्य को पत्थर बनाना चाहती है। तो ऐ समझदार इंसान! अब थोड़ा संभलना सीख, हर समझौते को अपनी महानता मत मान, जहाँ 'समझना' केवल तुम्हारी जिम्मेदारी बन जाए, वहाँ समझ लेना, कि हो रहा है तुम्हारा अपमान। असली समझदारी झुकने में नहीं, कभी-कभी दीवार की तरह खड़े होने में है, पूरी दुनिया को समझने से कहीं बेहतर, खुद को खुद की नज़रों में बचाए रखने में है।

कलमकार

खिरसिन्धु साहू

✨ Editor's Choice