योगेश कुमार साहू 'युग'

"साहित्यिक यात्रा..."

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मैं इस कदर हार जाऊंगा...

"मैं इस कदर हार जाऊँगा, कि तुम जीत कर भी पछताओगे। जिस ख़ामोशी पर हँसते हो आज, उसी सन्नाटे से घबराओगे। मैं शिकवा भी न करूँगा तुमसे, न कोई इल्ज़ाम लगाऊँग"

साथ छूट रहा है

"न जाने क्या छूट रहा है, दिल अंदर ही अंदर टूट रहा है… तेरी खामोशी कुछ यूँ नाराज़ है मुझसे, जैसे अपना ही कोई मुझसे रूठ रहा है। ​वो जो लफ़्ज़ों के दरमियां "

मैं हूं तो शिकायत है

"मैं हूं तो शिकायत है, लड़ाई है, झगड़ा है, मेरी हर बात पर तुम्हारा यूँ रूठ जाना भी बड़ा प्यारा है। कभी सोचा है… अगर मैं ना रहूं, तो तुम्हारी नाराज़गी क"

तेरा मिलना

"जिंदगी का सबसे खूबसूरत पल था मेरा तुमसे मिलना, जैसे सूनी राहों को मिल गया हो अपना कोई सिलसिला। तेरी आँखों में झाँका तो खुद को भूल गया, जैसे कोई ख्वाब "

मैं नहीं

" मैं किसी की ज़रूरत नहीं, बस एक आदत था… और आदतें बदल ही जाती हैं। मेरे होने या न होने से फर्क नहीं पड़ता, लोग वैसे भी जीना सीख ही जाते हैं। मैं खास नह"

​अधूरी गलियाँ और डिजिटल अधूरापन

"​कुछ रिश्ते कभी मुकम्मल नहीं होते, फिर भी ये दिल उन्हें किस्तों में जीता रहता है... बिना किसी नाम के, बिना किसी वादे के, वो रूह के उस कोने में बसे हैं"

उम्रभर की याद

"वह शख्स जो बिछड़ के कभी लौटकर नहीं आते, फिर उनके बाद मौसम भी खुशी के गीत नहीं गाते। ​हक़ीक़त है कि फिर ये ज़िंदगी, वो ज़िंदगी ही नहीं रहती, हँसी के ओट "

तन्हा सफर

"लोग चाहे कितने भी करीब हो, लेकिन हर कोई अकेला है ज़िंदगी के सफर में। भीड़ के बीच भी दिल में अपना दर्द छुपाता है, हर चेहरा मुस्कानों में कुछ राज़ दबाता"

मान जाओ ना

"“अंत में परिणाम ही देखे जाते हैं, किसी के लिए किए गए प्रयास नहीं… पर मैंने हर कोशिश में सिर्फ तुम्हें चाहा है, हर सांस में बस तुम्हारा नाम ही रहा है। "

जिंदगी का हिसाब

"जिंदगी का हिसाब लगाया, तो कई पन्ने यूँ ही पलट गए। कुछ सपने वक्त की धूल में खो गए, कुछ अपने राह बदलकर निकल गए। हर मुस्कान किसी और के नाम लिखी, हर आँसू "

परिवर्तन का स्वागत

"परिवर्तन से कभी डरना नहीं, यह जीवन का सबसे सच्चा नियम होता है। जो आज दूर चला जाता है, वही कल किसी नई खुशी की वजह होता है। हर बिछड़न अपने साथ एक नया सब"

जिसकी जैसी नज़र थी

"अच्छे ने अच्छा कहा मुझे, बुरे ने बुरा कहा मुझे। जिसको जितनी ज़रूरत थी, उतना ही पहचाना मुझे। किसी ने मुस्कान समझा, किसी ने ख़ामोशी का नाम दिया। किसी ने"

मैं हारा नहीं

"कल मैंने कोशिश की थी, किस्मत से नहीं—इंसानियत से जुड़कर, तेरे लिए कदम बढ़ाया था, दिल से, बिना कोई हिसाब जोड़कर। तूने हँसकर कह दिया— “देखो, तुम हार गए…"

रिश्ते की पुकार

"अगर मेरा साथ तुम्हें बोझ लगने लगे, तो मुझे कहना मगर यूँ चुप रहना मत। अगर मेरा साथ तुम्हें बीच राह लगने लगे, तो मेरा हाथ थामे रखना, छोड़ना मत। मैं धूप "

संवादों की अमर दास्ताँ

"15 बरस की मासूम उम्र थी, जब पहली बार दिल ने तेरे नाम से धड़कना सीखा था। ना दुनिया की समझ थी, ना रिश्तों की परिभाषा जानते थे, बस इतना एहसास था— तेरे सा"

वक्त, वक्त की बात है.....

"वक्त, वक्त की बात है...... जब ज़रूरत थी, वही सबसे पहले याद आया, उसकी हर बात में सुकून सा पाया। वक़्त भी उसका तब अनमोल लगता था, उसकी मौजूदगी से ही सब स"

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