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काव्य कुंज

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विधा तारीख

मैं इस कदर हार जाऊंगा...

मैं इस कदर हार जाऊँगा, कि तुम जीत कर भी पछताओगे। जिस ख़ामोशी पर हँसते हो आज, उसी सन्नाटे से घबराओगे। मैं शिकवा भी न करूँगा तुमसे, न कोई इल्ज़ाम लगाऊँगा। बस अपनी यादों की दहलीज़ से, चुपचाप एक दिन गुजर जाऊँगा। फिर मेरी कमी का एहसास होगा, जब हर चेहरा अजनबी लगेगा। जिसे समझा था तुमने साधारण, वही सबसे अनमोल लगेगा। मैं लौटकर भी न लौटूँगा, वक़्त मुझे इतना बदल देगा। तुम पुकारोगे नाम मेरा, पर जवाब सिर्फ़ सन्नाटा देगा। तब समझोगे हार किसे कहते हैं, और जीत का बोझ क्या होता है। जब अपना होकर भी कोई, हमेशा के लिए खो जाता है। मैं इस कदर हार जाऊँगा, कि तुम जीत कर भी पछताओगे। मेरी ख़ामोशी की गूँज से, ज़िंदगी भर ख़ुद को समझाओगे।

कलमकार

Yogesh Sahu

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