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तन्हा सफर
रचनाकार की आवाज में:
लोग चाहे कितने भी करीब हो,
लेकिन हर कोई अकेला है ज़िंदगी के सफर में।
भीड़ के बीच भी दिल में अपना दर्द छुपाता है,
हर चेहरा मुस्कानों में कुछ राज़ दबाता है।
साथ चलते हैं लोग बस कुछ दूर राहों तक,
फिर मोड़ आते हैं बिछड़ने के निगाहों तक।
हर किसी के हिस्से में तन्हा रातें आती हैं,
खामोशी बनकर कई बातें सताती हैं।
फिर भी इंसान उम्मीद का दिया जलाता है,
टूटकर भी हर सुबह खुद को उठाता है।
अकेलापन ही अक्सर खुद से मिला देता है,
ज़िंदगी का सफर फिर जीना सिखा देता है।
कलमकार