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काव्य कुंज

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विधा तारीख

​अधूरी गलियाँ और डिजिटल अधूरापन

​कुछ रिश्ते कभी मुकम्मल नहीं होते, फिर भी ये दिल उन्हें किस्तों में जीता रहता है... बिना किसी नाम के, बिना किसी वादे के, वो रूह के उस कोने में बसे हैं, जहाँ WiFi नहीं, सिर्फ वफ़ा का नेटवर्क मिलता है। ​न साथ चलने की कोई लकीर मिली, न Google Maps पर उन यादों का कोई पता मिला, मगर ये नादान दिल भी बड़ा जिद्दी है, दुनिया की हर सड़क छोड़, U-turn मार के उसी की गली में जा ठहरता है। ​वो अनकही बातें, वो आधे-अधूरे से ख़्वाब, वो नींद में ढूँढे गए बेमतलब से जवाब... आज भी बंद आँखों के पीछे Buffering करते हैं, जो मुकम्मल होकर 'Old Fashioned' न हुए, वही तो आज भी दिल में Trending रहते हैं। ​न कोई शिकवा है अब, न कोई मलाल बचा है, बस एक खामोश सा, मीठा सा एहसास है... जो मैसेज 'Seen' होकर भी कभी 'Reply' न हुआ, यकीन मानिए, इस शोर भरी दुनिया में वही सन्नाटा सबसे खास है। ​कुछ रिश्ते बेशक अधूरे रह जाते हैं, पर दिल उन्हें अपनी पूरी जागीर मानता है... शायद इसी खालीपन की आग में तपकर, इश्क़ का पैमाना 100% Charge हो जाता है। ​और हम? हम ताउम्र बस उस चार्जर की तलाश में, अपनी रूह को खाली करते रह जाते हैं।

कलमकार

योगेश कुमार साहू 'युग'

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