रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
वक्त, वक्त की बात है.....
रचनाकार की आवाज में:
वक्त, वक्त की बात है......
जब ज़रूरत थी, वही सबसे पहले याद आया,
उसकी हर बात में सुकून सा पाया।
वक़्त भी उसका तब अनमोल लगता था,
उसकी मौजूदगी से ही सब संभल जाता था।
पर काम खत्म होते ही सब बदल गया,
वो इंसान था या बस एक पड़ाव, ये समझ ही न आया।
कुछ लोग रिश्ते नहीं निभाते,
बस अपनी ज़रूरतें जोड़ लेते हैं।
जब तक काम रहता है,
तब तक साथ भी गहरा होता है,
और जैसे ही मतलब खत्म हुआ,
वैसे ही एहसास भी खो जाते हैं।
जिसे अपना समझकर हर बात बताई,
वही एक दिन अजनबी बनकर निकल गया।
शायद वो रिश्ता नहीं,
बस एक ज़रूरत का सफर था,
जो मंज़िल मिलते ही खत्म हो गया।
हम समझते रहे उसे अपना,
वो हमें बस एक ज़रिया मानता रहा।
हम दिल से जुड़े रहे,
और वो काम से जुड़ा रहा।
Yug
कलमकार