Logo

काव्य कुंज

A+
A-
🌙
विधा तारीख

मान जाओ ना

“अंत में परिणाम ही देखे जाते हैं, किसी के लिए किए गए प्रयास नहीं… पर मैंने हर कोशिश में सिर्फ तुम्हें चाहा है, हर सांस में बस तुम्हारा नाम ही रहा है। कल जो अल्फ़ाज़ अधूरे रह गए थे, आज उन्हें दिल की धड़कनों से सजाया है… तुम नाराज़ हो तो लगता है जैसे, मेरे हिस्से का चाँद किसी ने छुपाया है। तुम्हारी आँखों की वो हल्की सी शरारत, आज भी मेरे दिल को बेकरार करती है… और तुम्हारी वो करीब आने की आदत, मेरी हर रात को प्यार से भर देती है। मान जाओ ना अब… ये दिल तुम्हारे बिना कहीं लगता नहीं, क्योंकि मोहब्बत सिर्फ जिस्म से नहीं, तुम्हारी रूह से भी बेइंतहा है मुझे…”

कलमकार

योगेश कुमार साहू 'युग'

✨ Editor's Choice