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काव्य कुंज

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विधा तारीख

मैं नहीं

मैं किसी की ज़रूरत नहीं, बस एक आदत था… और आदतें बदल ही जाती हैं। मेरे होने या न होने से फर्क नहीं पड़ता, लोग वैसे भी जीना सीख ही जाते हैं। मैं खास नहीं था किसी के लिए, इसलिए मेरा जाना भी आम ही रहा। जिसे मेरी कद्र नहीं, उसे मेरी कमी भी महसूस नहीं होगी। मैं वो नहीं जो किसी की दुनिया रोक दे, मेरे बिना सब चलता रहता है। मैं किसी की मजबूरी नहीं, इसलिए मेरा होना भी जरूरी नहीं। मेरे बिना भी सब ठीक है, शायद मैं कभी जरूरी था ही नहीं। मैं सिर्फ एक हिस्सा था, पूरी कहानी तो मेरे बिना भी पूरी हो जाती है। मेरी जगह कोई भी ले सकता है, क्योंकि मैं कभी खास था ही नहीं। मैं वो इंसान हूं जिसे भूलना मुश्किल नहीं, बस वक्त की बात है। 'yug'

कलमकार

योगेश कुमार साहू 'युग'

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