रचना की खोज जारी है...
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साथ छूट रहा है
रचनाकार की आवाज में:
न जाने क्या छूट रहा है,
दिल अंदर ही अंदर टूट रहा है…
तेरी खामोशी कुछ यूँ नाराज़ है मुझसे,
जैसे अपना ही कोई मुझसे रूठ रहा है।
वो जो लफ़्ज़ों के दरमियां एक पुल था,
अब धीरे-धीरे वो भी टूट रहा है।
हाथों में हाथ तो है आज भी मगर,
जैसे कोई गहरा साथ छूट रहा है।
सवालों का शोर है इस सन्नाटे के पीछे,
सुकून न जाने कहाँ पीछे छूट रहा है।
कहना बहुत कुछ है, पर लब सिल गए हैं,
सब्र का दामन भी अब हाथ से छूट रहा है।
तू सामने है, पर नज़रों में वो बात नहीं,
वक़्त जैसे रेत बन उँगलियों से छूट रहा है।
उम्मीद की लौ अब मद्धम सी पड़ गई,
लगता है कोई ख्वाब आँखों से छूट रहा है।
कलमकार