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संवादों की अमर दास्ताँ
रचनाकार की आवाज में:
15 बरस की मासूम उम्र थी,
जब पहली बार दिल ने
तेरे नाम से धड़कना सीखा था।
ना दुनिया की समझ थी,
ना रिश्तों की परिभाषा जानते थे,
बस इतना एहसास था—
तेरे साथ होने वाले संवाद
हर दिन को खास बना देते थे।
तेरी बातें सुबह जैसी लगती थीं,
तेरी हँसी किसी मधुर गीत सी,
और तेरे शब्दों में......
एक अपनापन बसता था।
बातों-बातों में उम्र बढ़ती रही,
15 से 23 तक का सफर
तेरे मेरे संवादों में सिमट गया।
फिर वक़्त ने करवट बदली,
और वो सिलसिला थम गया,
शब्द चुप हो गए,
आवाज़ें कहीं खो गईं,
और दिन फिर साधारण हो गए।
कुछ हँसी के पल,
कुछ मासूम सवाल,
कुछ अनकहे एहसास—
सब फिर से मन में गूँज उठते हैं।
खुश रहना, मुस्कुराते रहना।
क्योंकि कुछ लोग दूर होकर भी
अपनी बातों से पास रहते हैं।
कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते,
बस यादों में जीवित रहते हैं।
वही खूबसूरत अध्याय है,
जो समाप्त होकर भी
मन में आज तक खुला है।
कलमकार