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जिंदगी का हिसाब
रचनाकार की आवाज में:
जिंदगी का हिसाब लगाया,
तो कई पन्ने यूँ ही पलट गए।
कुछ सपने वक्त की धूल में खो गए,
कुछ अपने राह बदलकर निकल गए।
हर मुस्कान किसी और के नाम लिखी,
हर आँसू चुपचाप पीते रहे।
अपने हिस्से की धूप भी बाँट दी,
और खुद छाँव को तरसते रहे।
जिंदगी का हिसाब लगाया तो पता चला,
मुनाफा खुद के जीने में था,
और हम दूसरों के लिए खर्च हो गए।
रिश्तों की फसल सींचते-सींचते,
अपने ही आँगन की मिट्टी सूख गई।
सबकी मंज़िल आसान बनाते रहे,
अपनी राह मगर कहीं छूट गई।
न कोई शिकवा है, न कोई गिला,
बस इतना सा एहसास बाकी है—
अगर थोड़ा-सा वक्त खुद पर भी लगाया होता,
तो शायद ज़िंदगी का रंग कुछ और होता।
कलमकार