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काव्य कुंज

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विधा तारीख

मैं हारा नहीं

कल मैंने कोशिश की थी, किस्मत से नहीं—इंसानियत से जुड़कर, तेरे लिए कदम बढ़ाया था, दिल से, बिना कोई हिसाब जोड़कर। तूने हँसकर कह दिया— “देखो, तुम हार गए…” और ये शब्द जैसे चिपका दिए, जैसे मैं कोई खेल हार गया। पर सच ये है, मैं मैदान में उतरा ही नहीं था जीतने, मैं तो आया था बस साथ देने, तेरे लिए थोड़ा सा जीने। अगर हार यही है— कि मैंने बिना मतलब मदद की, तो हाँ, मैं हर बार हारूँगा, क्योंकि मेरी नीयत कभी गलत नहीं थी। तू जीत गई अपने शब्दों में, मैं जीत गया अपने कर्म में, फर्क बस इतना है— तूने ताना चुना, मैंने इंसानियत। और हाँ, थोड़ा सीधा हूँ, थोड़ा सादा हूँ, शायद तेरी नजर में “भोला” हूँ…

कलमकार

योगेश कुमार साहू 'युग'

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