Logo

काव्य कुंज

A+
A-
🌙
विधा तारीख

उम्रभर की याद

वह शख्स जो बिछड़ के कभी लौटकर नहीं आते, फिर उनके बाद मौसम भी खुशी के गीत नहीं गाते। ​हक़ीक़त है कि फिर ये ज़िंदगी, वो ज़िंदगी ही नहीं रहती, हँसी के ओट में बस अश्क़ हैं, जो दिख नहीं पाते। ​मकां में शय वही है, पर वो रौनक अब कहाँ ढूँढें? ये दीवारें भी चुप रहकर सिर्फ उनकी याद दोहराते। ​सहर तो रोज़ होती है, मगर बे-नूर लगती है, न जाने क्यों अब अपने भी पराए से नज़र आते। ​हमें साँसों को समझौते की सूरत खींचना होगा, कि टूटे दिल को मंज़िल के नए रस्ते नहीं भाते। ​कभी रुकती नहीं ये ज़िंदगी, बस ढल ही जाती है, कि ज़ख्म अंदर ही रहते हैं, जो बाहर आ नहीं पाते। ​सिखा जाते हैं वो 'जाते हुए' जीने का फ़न हमको, जो वापस आ नहीं सकते, वही उम्र भर याद आते

कलमकार

योगेश कुमार साहू 'युग'

✨ Editor's Choice