रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
उम्रभर की याद
रचनाकार की आवाज में:
वह शख्स जो बिछड़ के कभी लौटकर नहीं आते,
फिर उनके बाद मौसम भी खुशी के गीत नहीं गाते।
हक़ीक़त है कि फिर ये ज़िंदगी, वो ज़िंदगी ही नहीं रहती,
हँसी के ओट में बस अश्क़ हैं, जो दिख नहीं पाते।
मकां में शय वही है, पर वो रौनक अब कहाँ ढूँढें?
ये दीवारें भी चुप रहकर सिर्फ उनकी याद दोहराते।
सहर तो रोज़ होती है, मगर बे-नूर लगती है,
न जाने क्यों अब अपने भी पराए से नज़र आते।
हमें साँसों को समझौते की सूरत खींचना होगा,
कि टूटे दिल को मंज़िल के नए रस्ते नहीं भाते।
कभी रुकती नहीं ये ज़िंदगी, बस ढल ही जाती है,
कि ज़ख्म अंदर ही रहते हैं, जो बाहर आ नहीं पाते।
सिखा जाते हैं वो 'जाते हुए' जीने का फ़न हमको,
जो वापस आ नहीं सकते, वही उम्र भर याद आते
कलमकार