"साहित्यिक यात्रा..."
"कवि न रहा मैं कभी वचन प्रवीण देखो, ले-दे के दो चार पंक्ति लिख पाता हूँ। घटती है घटना प्रतिदिन अप्रतिम यहाँ, किंतु मैं तो एक दो को ही देख पाता हूँ। होग"
"चल उड़ता चल रे पंछी……………! चल उड़ता चल रे पंछी! यहाँ है तेरा मुकाम नहीं। गीत गति के गाता चल, जीवन में कहीं विराम नहीं।।टेक।। कहीं पे खूशबू फूलों की, कहीं"