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चल उड़ता चल रे पंछी
रचनाकार की आवाज में:
चल उड़ता चल रे पंछी……………!
चल उड़ता चल रे पंछी!
यहाँ है तेरा मुकाम नहीं।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं।।टेक।।
कहीं पे खूशबू फूलों की,
कहीं पे चुभन है कांटों का।
झेल ले झंझावात पखेरू,
यह अनुभव है बाटों का।।
क्रोध किया तो क्या मिलेगा,
गुस्सा तो आयेगा काम नहीं।।1।।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं……..
गौर करो हे गगनविहारी,
तेरे जमीर को कोई ललकारा है।
तुम अभिनंदन कर ले उनका,
जिसने तुम्हें फटकारा है।।
चिड़चिड़ाना छोड़ विहंगे!
इनसे बनता काम नहीं।।2।।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं……..
चलने से बढ़ते सभी हैं,
सोने वालों ने क्या पाया कभी।
तेज गतिशील शशक पुत्र भी,
था कछुए से शरमाया कभी।।
अब ईर्ष्या अमर्ष की छोड़ कहानी,
चुन ले अपना मुकाम सही।।3।।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं……..
कल रहा सो बीत गया,
फिर कल कभी नहीं आएगा।
अब तो कमर कस कस ले हंसे!
फिर बाजी कौआ ले जाएगा।।
निराशा व्यूह का भेदन कर दे,
अभिमन्यु हुआ नाकाम नहीं।।4।।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं……..
खिन्न मलिन गतिहीन जीवन,
चिंताओं का सार मिला।
वैभवशाली बना पराजित,
जब उद्वेगों का हार मिला।।
उत्साह ज्वाल से खाक मिला दे,
नाकामी का नाम नहीं।।5।।
गीत गति के गाता चल,
जीवन में कहीं विराम नहीं……. ~~ बनारसी यादव "प्राणसखा" बगीचा, जिला जशपुर(छ.ग.) मो.नं. 7999350640
कलमकार