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बसंत बीत गए
रचनाकार की आवाज में:
कवि न रहा मैं कभी वचन प्रवीण देखो,
ले-दे के दो चार पंक्ति लिख पाता हूँ।
घटती है घटना प्रतिदिन अप्रतिम यहाँ,
किंतु मैं तो एक दो को ही देख पाता हूँ।
होगा एक दिन धन धाम हमारा भी,
यही चिंता में पीछे भागते ही रहता हूँ।
निश्चिंत सोऊंगा कल नरम शैय्या पर,
सोंचकर रात भर जागते ही रहता हूँ।।1।।
कौड़ी कौड़ी जोड़ते बसंत बीत गए देखो,
शिशिर के गिनती में गलती होई जाती है।
जाने अनजाने देखो आ गए हैं पतझड़ ,
पत्तियों की गति देखी जिया अकुलाती है।
सजे हुए सपने अपने सुमनों के हार से,
काल का कमाल देखो कलि लुटी जाती है।
प्राणसखा! मेरे अब भी कुछ विचार करो,
धन धाम धरा पर यूं ही छुटी जाती है।।2।।
~~ बनारसी यादव "प्राणसखा"
बगीचा, जिला जशपुर(छ.ग.)
मो.नं. 7999350640
कलमकार