"साहित्यिक यात्रा..."
"पक्षी प्यासे मर रहे हैं, छाया भी अब रूठ गई, इंसानों के लालच में, कुदरत की डोरी टूट गई। भीषण गर्मी की ये लहरें, जैसे कोई सजा मिली, पेड़ काटकर हमने अपनी,"
"पुरानी रुत ने अपना आंचल अब समेटा है, हवा की लहर ने यादों को फिर से लेटा है। बदलती धूप की रंगत बता रही है हमें, कि वक्त ने एक नया रुख यहाँ उकेरा है। "