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काव्य कुंज

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विधा तारीख

पिघलती दुनिया

पक्षी प्यासे मर रहे हैं, छाया भी अब रूठ गई, इंसानों के लालच में, कुदरत की डोरी टूट गई। भीषण गर्मी की ये लहरें, जैसे कोई सजा मिली, पेड़ काटकर हमने अपनी, कब्र स्वयं ही खोद ली। ​नदियों का पानी सूखा है, धरती पर दरारें हैं, आने वाले कल के लिए, बस मौत की दीवारें हैं। ठंडी हवा अब ढूँढ रहे हो, पर जंगल सब काट दिए, सुख-सुविधा की चाहत में, ज़हर हवा में बाँट दिए। ​पसीने से तर-बतर बदन, और प्यास से बेहाल हैं हम, अपनी ही गलतियों का देखो, बनते खुद शिकार हैं हम। अभी नहीं जो जागे तुम तो, पानी को तरसोगे तुम, आग बरसेगी आसमान से, घर में भी झुलसोगे तुम। ​चेत जाओ ऐ दुनिया वालों, वक्त हाथ से जाता है, प्रकृति का ये बदला देखो, सबको आज रुलाता है। ललित दास की कलम कहे, अब अंतिम संस्कार है, मानव की अपनी जिद ही, उसका असली हत्यार है।

कलमकार

ललित कुमार दास

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