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प्रकृति का प्रतिशोध
रचनाकार की आवाज में:
प्रकृति का प्रतिशोध
जिसकी गोद में कल तक खेले, सांस लिए और बड़े हुए
आज हम क्यों उसी प्रकृति को गंदा करने पर हैं अड़े हुए
देखो ऐसा हरगिज़ न हो आ जाए उसको हम पर क्रोध
देखो कहीं न लेने लगे ये प्रकृति अब हमसे प्रतिशोध
देखा है हमने भी पहले इसका कैसा भयानक रौद्र रूप
जब न कहीं ठंडी छाया थी, केवल जलता सूरज और धूप
जल भुन कर मर जायेंगे जो हमने किया नहीं अब ख्याल
चलो करें मिल जुलकर हमसब इसकी ठीक से देखभाल।
अनमोल
कलमकार