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काव्य कुंज

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विधा तारीख

कल्पनाओं से भरा एक लम्हा

कल्पनाओं से भरा एक लम्हा रात के १ बज रहे हैं, आंखों में नींद कहां थी, बस तुम्हारी तस्वीर देखते बैठा था, और सोच रहा था कि आज तुम पर क्या लिखूं क्योंकि आंखें नम थीं, दर्द गहरा था, पर तुम्हारी तस्वीर देख दिल मुस्कुरा रहा था, आज न जाने क्यों पुरानी बातें याद आ रही थी, दिल फ्लॅशबॅक में हिलोरे ले रहा था, जब हम साथ थे, हाथों में हाथ था, कितनी कठिनाईयां थी, लेकिन उन हालात में भी तुम्हारा रोंवां रोवां सुकुन से भरा रहता था, जैसे कोई अप्सरा धरती पर थी, नवरात्र में नऊ_माता का तेज़ जैसे धरती पर होता है वैसा तेज़ # तुम्हारा था और यह सब सोचते सोचते अकस्मात दिल में जज़्बात बहुत जोर से उमड़ पड़े और पुराना कुछ लिखने का मन हुआ, शायद इसलिए कि कुछ एहसास ऐसे होते हैं जो बोलने से नहीं, सिर्फ़ शब्दों में ढलकर ही अपना रास्ता खोजते हैं। # तुम्हें सोचता हूँ तो सबसे पहले तुम्हारी कलाईयों में खनकती हुई चूड़ियों की आवाज़ सुनाई देती है। जैसे किसी शांत दोपहर में मंदिर की घंटियाँ धीमे-धीमे बज रही हों। उन चूड़ियों की खनक में जाने कितनी छोटी-छोटी खुशियाँ छुपी रहती हैं जैसे हर छनक एक नई कहानी कह रही हो। कभी-कभी लगता है कि अगर कोई तुम्हारी कलाई पकड़कर उस खनक को सुन ले, तो उसे दुनिया की सारी थकान से थोड़ी देर की मुक्ति मिल जाए। # तुम्हारे माथे की वो छोटी सी बिंदी, सच कहूँ तो वो बिंदी सिर्फ़ एक लाल बिंदी नहीं होती, वो तो जैसे किसी कविता का पूर्ण विराम हो, जैसे किसी शांत झील के बीच में डूबता हुआ सूरज। तुम्हारा चेहरा वैसे ही खिल उठता है, जैसे किसी सफ़ेद कागज़ पर अचानक किसी ने प्रेम का पहला शब्द लिख दिया हो। #तुम्हारे पैरों में लगा आलता…वो मुझे हमेशा अजीब सी कोमलता से भर देता है। ऐसा लगता है जैसे धरती ने तुम्हारे कदमों को अपने रंग से सजाया हो। जब तुम चलती होगी, तो शायद ज़मीन भी हल्की-सी मुस्कुरा उठती होगी जैसे उसे पता हो कि उस पर कोई बहुत नर्म एहसास चल रहा है। # तुम्हारी वो श्रृंगार दानी…उसमें रखी छोटी-छोटी चीज़ें भी मुझे बड़ी प्यारी लगती हैं। कंघी, बिंदी की पत्तियाँ, चूड़ियों का छोटा डिब्बा, काजल की पतली सी डंडी सब जैसे तुम्हारी मासूम आदतों के गवाह हों। कभी-कभी सोचता हूँ अगर कोई उन चीज़ों को चुपचाप देखे, तो उसे तुम्हारी पूरी दुनिया की झलक मिल जाएगी। # तुम्हारी आलमारी भी शायद तुम्हारे जैसी ही होगी, थोड़ी सजी हुई, थोड़ी बिखरी हुई, पर हर तह में एक कहानी छुपाए हुए। उसमें रखी साड़ियाँ किसी में हल्की सी खुशबू होगी, किसी में किसी बीते दिन की याद, और किसी में शायद वह दिन भी छुपा होगा जब तुमने पहली बार उसे पहनकर आईने में खुद को थोड़ी देर तक देखा होगा। #तुम्हारा कमरा…मुझे लगता है वह कमरा सिर्फ़ ईंटों और दीवारों का नहीं होगा। उसमें तुम्हारी हँसी की हल्की गूंज होगी, कुछ अधूरी सोचें होंगी, और शायद खिड़की से आती हवा में तुम्हारे बालों की खुशबू भी घुली होगी। वह कमरा शायद जानता होगा कि तुम कभी चुपचाप बैठकर क्या सोचती हो। # सच कहूँ तो तुम्हारे आसपास की हर छोटी चीज़ चूड़ी, बिंदी, आलता, साड़ी, आलमारी, वह छोटा सा कमरा सब मिलकर तुम्हारी एक ऐसी दुनिया बनाते हैं जिसे दूर से देखकर भी मन में एक अजीब सा सुकून उतर आता है। और # यह सब लिखते वक्त मैं बस कभी-कभी चुपचाप बैठकर यही सोचता हूँ कि शायद दुनिया की सबसे सच्ची कविताएँ कागज़ पर नहीं लिखी जातीं। वो #तुम्हारी कलाई में खनकती चूड़ियों में होती हैं, #तुम्हारे माथे की बिंदी में होती हैं और #तुम्हारे खामोशियों में छुपी मुस्कुराहट में रहती हैं। # लिखते समय मुझे कहीं भी नहीं लगा कि मैं फ्लॅशबॅक लिख रहा हूं, ऐसा लग रहा था कि #तुम सामने ही हो और तुम्हारी एक एक अदा को कागज़ पर उतार रहा हूं, लिखते लिखते सुबह के ७ बज गए और मुझे फ्रेश होकर काम पर भी जाना है इसलिए आज बस इतना ही लिख रहा हूँ… बाकी जो बचा है, वह शायद अगली बार शब्दों में ढल जाएगा। तुम्हारा कल्पनाओं से भरा लम्हा प्रतिभा दिनेश कर विकासखण्ड सरायपाली

कलमकार

प्रतिभा दिनेश कर

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