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काव्य कुंज

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विधा तारीख

पर्यावरण संरक्षण

वसुंधरा तपने लगी, झुलस रहा है शरीर । पादप सब मुरझा गए, व्यर्थ हुए तदबीर।। सागर के जल भी हुए बहुत अब गर्म। कूलर और पंखे की हवा भी करते शर्म।। राह चलते पथिक को तनिक कहाँ विश्राम । सूर्य की तेज किरणों से बनता नहीं कुछ काम।। कितने मधुर दिन थे ,जब थे मिट्टी के सबके घर। नहीं इतने तपिश हुए कभी, शीतलता था उसके भीतर। बड़े- बड़े बिल्डिंगों में, गर्मी में सब बंटाधार। सुबह से लेकर रात तक चलते कूलर ,ए सी लगातार।। गर्मी बढ़ रही तेजतर्रार, प्रति वर्ष ढाई डिग्री पार, पेड़ -पौधों की अंधाधुंध हो रही कटाई लगातार।। गर्मी बढ़ने का कारण अनेक कल कारखानों की गंदगी मोटर वाहनों के कार्बनिक गैसें, पेड़ पौधों की लगातार कटाई। जल संरक्षण, मृदा संरक्षण, पेड़- पौधों की करें संरक्षण आओ मिलकर हम सब चलाएं, पर्यावरण संरक्षण अभियान ।। आओ मिलकर दीजिए परिचय, करें घर परिवार समाज की सुरक्षा। पशु -पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन, माँ भारती के बढ़ायें मान करें आत्मरक्षा।। शंकर सिंह सिदार" रत्नेश" प्रधान पाठक जमदरहा

कलमकार

Sankar Sidar

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