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काव्य कुंज

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विधा तारीख

प्रेम

प्रेम वह दीप है जो अंधकार से संघर्ष नहीं करता, बस जलता है— और अंधकार स्वयं ही पराजित होकर मिट जाता है। प्रेम वह निर्मल सरिता है जो अहंकार के कठोर पर्वतों को धीरे-धीरे घिसती हुई करुणा के मैदानों में जीवन की हरियाली उगा देती है। प्रेम वह मधुर समीर है जो थके हुए मन को छूकर दुःख की धूल झाड़ देता है, और आँसुओं को मुस्कानों के मोती बना देता है। जहाँ प्रेम है वहाँ सीमाएँ नहीं रहतीं, वहाँ “मैं” और “तुम” एक ही आकाश के दो उजले नक्षत्र बन जाते हैं। प्रेम में तर्क नहीं, प्रेम में व्यापार नहीं— यह तो समर्पण का अथाह, निर्मल सागर है जिसमें डूबकर मनुष्य स्वयं को ही पा लेता है। सृष्टि का प्रत्येक स्पंदन प्रेम से ही घटित है— सूर्य का उदय, चन्द्रमा की शीतलता, पुष्पों की सुगंध, और जीवन की हर धुन। इसलिए प्रेम केवल भावना नहीं, यह सृष्टि का शाश्वत सत्य है— जिसे जिसने हृदय से जाना, उसने समूचे ब्रह्माण्ड को अपनी आत्मा में समेट लिया। और तब समझ में आता है— प्रेम वही है जो सबको जोड़ता है, और स्वयं कभी टूटता नहीं।

कलमकार

रवि

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