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काव्य कुंज

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गरमी म नाला सूख जाथे, पानी बर तरसय गाँव, बरसात आवतेंच बाढ़ म बदलय, बढ़ जाथे सबके दाँव। पढ़ई ठप्प, रोजगार बंद, थम जाथे आवागमन, लइका मन स्कूल नइ पहुँच पावंय, बढ़ जाथे सबके मन म चिंता घन। गरमी म नाला सूख जाथे, पानी बर तरसय गाँव, बरसात आवतेंच बाढ़ म बदलय, बढ़ जाथे सबके दाँव। पढ़ई ठप्प, रोजगार बंद, थम जाथे आवागमन, लइका मन स्कूल नइ पहुँच पावंय, बढ़ जाथे सबके मन म चिंता घन। स्वास्थ्य बिगड़े, पैदल चले घलो हो जाथे भारी, नाला के मार ले स्कूल म , शिक्षक के कमी बन गे लाचारी। मजदूर मन काम बर तरसयं, किसान घलो होवयं लाचार, एक नाला के मार झेलत हे, पूरा कोकड़ी गाँव बार-बार। कब बनही मजबूत पुलिया, कब मिलही राहत के राह, कोकड़ी के जनता पूछत हे— आखिर कब सुनही सरकार हमर चाह? प्रतिभा दिनेश कर विकासखण्ड सरायपाली
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