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अधूरी अभिलाषा
रचनाकार की आवाज में:
नयनों में स्वप्न की रचना कोई अधूरी रह गई,
हमारे मध्य की वह अनकही दूरी रह गई।
घटाएँ प्रेम की घिर कर गगन में छा गई थीं पर,
नृत्य करने से वंचित आज एक मयूरी रह गई।
तुम्हारी स्मृति की चंदन महकती है अभी मन में,
भटकती वन में जैसे गंध वह कस्तूरी रह गई।
प्रतीक्षा में नयन के दीप तो मैंने जलाए थे,
क्षितिज पर भोर की आभा कहीं सिंदूरी रह गई।
कथा जो जन्म-जन्मांतर की हमने गढ़ी थी मन में,
पृष्ठ कुछ जुड़ गए, पर वो कथा अधूरी रह गई।
कलमकार