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काव्य कुंज

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विधा तारीख

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भोले बने रहे तो जग में, बहुत बढ़िया कहे जाओगे, थोड़ा समझने क्या लगे, किसी को पसंद नहीं आओगे। जब तक तुम्हारी आँखों पर, नादानी का वो चश्मा है, जब तक तुम्हारी चुप्पी से, चलता उनका हर फसाना है। कठपुतली बन नाचते रहो, तो सबकी तालियाँ पाओगे, भोले बने रहे तो जग में, बहुत बढ़िया कहे जाओगे। जिस दिन तुमने अक्ल से, बातों को तौलना सीख लिया, मीठे शब्दों के पीछे का, असली मकसद जो चीन्ह लिया। अपने हक़ की खातिर जब, तुम आवाज़ ज़रा उठाओगे, थोड़ा समझने क्या लगे, किसी को पसंद नहीं आओगे। इस दुनिया को वो भाता है, जो हर बात पे सिर हिलाता हो, खुद की न कोई सोच हो जिसकी, बस हाँ में हाँ मिलाता हो। अपने हिस्से का आसमान, जिस दिन खुद नापने जाओगे, थोड़ा समझने क्या लगे, किसी को पसंद नहीं आओगे। उन्हें तुम्हारी समझदारी से, अपना पर्दा गिरता दिखता है, ज्ञानी हो जाने पर इंसान, कहाँ किसी के आगे झुकता है! जब उनके रचे हुए भ्रम को, तुम मिट्टी में मिलाओगे, थोड़ा समझने क्या लगे, किसी को पसंद नहीं आओगे। अफ़सोस न करना ऐ मुसाफिर, यह अक्लमंदी का गहना है, झूठी तारीफों से बेहतर, अपने स्वाभिमान में रहना है। भीड़ हमेशा उसी की है, जो मूर्ख बनकर जीता है, समझदार तो अक्सर ही, तन्हाई का घूँट पीता है। अब तय तुम्हें ही करना है, तुम खुद को क्या बनाओगे? भीड़ का हिस्सा बनोगे, या अपनी राह खुद सजाओगे? याद रहे... भोले बने रहे तो जग में, बहुत बढ़िया कहे जाओगे, थोड़ा समझने क्या लगे, किसी को पसंद नहीं आओगे।
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