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काव्य कुंज

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विधा तारीख

सूरज आग उगल रहा है

सूरज आग उगल रहा है पसीने से बदन जल रहा है समीर विश्राम कर रहा है अब तो सिर्फ हवा चल रहा है

कलमकार

नानदाऊ पटेल

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