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चंचल मन
रचनाकार की आवाज में:
कभी इधर तो कभी उधर, ये हवा सा उड़ता जाए,
एक पल में ये ज़मीन, तो दूजे पल आसमां छू आए।
तितली के पर लगाकर, हर फूल पे बैठना चाहे,
इस चंचल से मन की यारो, कोई थाह न कभी पाए।
अभी सोचा अतीत की, अभी भविष्य में खो जाता,
बंद आँखों से मीलों दूर के, सारे सफ़र तय कर आता।
न कोई दीवार रोके, न कोई ज़ंजीर इसे बांध सके,
इस ज़िद्दी और बंजारे को, भला कौन यहाँ साध सके?
"कभी समंदर की लहरों सा, कभी शांत सरोवर सा है,
इस भागते-दौड़ते मन की, बस इतनी सी कहानी है।"
अभी जो चीज़ भायी थी, अगले ही पल वो बेमानी है,
इसकी हर एक फरमाइश तो, जैसे कोई नादानी है।
कभी हंसाए, कभी रुलाए, कभी ख़्वाबों में भरमाए,
पास जो उसकी कद्र कहाँ, जो दूर है, उसे ये पाना चाहे।
सच पूछो तो इसके बिना, ज़िंदगी भी नीरस है,
इसी की इस बेताबी में ही, जीवन का हर एक रस है।
लगाम लगे रूठ जाएगा, इसे अपनी मौज में बहने दो,
इस चंचल मन की कश्ती को, ख्यालों में रहने दो।
कलमकार