रचना की खोज जारी है...
विधा
तारीख
तयशुदा
रचनाकार की आवाज में:
"सब तय है पहले से, की किस रास्ते पर चलना है, और कहाँ रुकना है।
हम तो बस किरदार हैं इस रंगमंच के, पटकथा तो पहले ही लिखी जा चुकी है।
पर क्या इस तयशुदा सफ़र में,
मुस्कुराना और संभलना भी हमारे हाथ नहीं?"
कलमकार