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बदलते मौसम ने जो दे दी है, अब एक हसीन दस्तक ।।
रचनाकार की आवाज में:
ना जाने क्यों पवन ने लिया रुख बदल,
ना जाने क्यों शीत लहर गई कुछ संभल,
कुछ पीत पुष्प चुपके-चुपके डालों से झरने लगे,
और हवा में महुए की मधुर महक भरने लगे।
कुछ खामोशी भी जैसे धीरे-धीरे करने लगी है, आहट
लगता है जैसे ग्रीष्म ऋतु ने की है फुसफुसाहट ।
प्रकृति के इस बदलाव में , एक अनकहा संदेश है,
हर अंत के बाद नवीन आगाज का परिवेश है।
देखो, वक़्त संग बदल गया “वानी” का मुक्तक ,
कल तक बसंत गीत लिखने वाले ,आज ग्रीष्म काल के नतमस्तक ,
क्योंकि बदलते मौसम ने जो दे दी है, अब एक हसीन दस्तक ।।
कलमकार