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काव्य कुंज

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विधा तारीख

बदलते मौसम ने जो दे दी है, अब एक हसीन दस्तक ।।

ना जाने क्यों पवन ने लिया रुख बदल, ना जाने क्यों शीत लहर गई कुछ संभल, कुछ पीत पुष्प चुपके-चुपके डालों से झरने लगे, और हवा में महुए की मधुर महक भरने लगे। कुछ खामोशी भी जैसे धीरे-धीरे करने लगी है, आहट लगता है जैसे ग्रीष्म ऋतु ने की है फुसफुसाहट । प्रकृति के इस बदलाव में , एक अनकहा संदेश है, हर अंत के बाद नवीन आगाज का परिवेश है। देखो, वक़्त संग बदल गया “वानी” का मुक्तक , कल तक बसंत गीत लिखने वाले ,आज ग्रीष्म काल के नतमस्तक , क्योंकि बदलते मौसम ने जो दे दी है, अब एक हसीन दस्तक ।।

कलमकार

कोरल वर्मा "वानी "

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