Logo

काव्य कुंज

A+
A-
🌙
विधा तारीख

बेवजह

कुछ ज़ख्म ऐसे ही, बस राह चलते मिल जाते हैं, बिना किसी खता के ही, दामन से लिपट जाते हैं। इंसान उलझ जाता है अक्सर, उम्र भर इस पहेली में, कि वो कौन से गुनाह थे, जिनके ये फल मिल जाते हैं। नींद साफ़ थी आँखों में, और नीयत काँच जैसी थी, फिर न जाने कहाँ से, ये पत्थर बरस जाते हैं। हाथों की लकीरों में तो, कोई दाग न था पहले, पर बिना स्याही के भी, कुछ धब्बे उभर आते हैं। वो कसक सबसे भारी है, जिसका कोई गवाह नहीं, हम सज़ा काट रहे हैं उस जुर्म की, जो हमने किया ही नहीं।

कलमकार

रवि

✨ Editor's Choice