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ग्रीष्म का ताप नृत्य
रचनाकार की आवाज में:
तपिश की लपटें, आकाश लालिमान,
सूरज की किरणें, पृथ्वी को जलाएँ।
पात पीले झरें, धरती सूखी सिसके,
वायु उष्ण चले, हृदय जलते रहें।
कोयल की कूक, उदास हो रही,
फूल मुरझाएँ, पंखुड़ियाँ मलिन।
नदी की धारा, संकुचित बहती,
तालाब सूखें, मछलियाँ तड़पें।
फिर मेघ संकेत, बिजली चमकाए,
वृष्टि की आशा, हृदय में जागे।
पर ग्रीष्म अटल, तपे वन-उपवन,
पसीना बहाए, जीवन का संघर्ष।
रात्रि में शीतल, चाँदनी बरसे,
तारे झिलमिलाए, ताप कम हो जाए।
पर प्रातः फिर, अग्नि प्रज्वलित,
ऋतु का चक्र, अनादि अनंत
ओस की बूँदें, क्षणिक सुख दें,
मनुष्य व्याकुल, छाया तलाशे।
ग्रीष्म का संदेश, सहनशीलता सिखाए,
बदलाव का द्वार, आशा से खोले।
कलमकार